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असद मिर्ज़ा
18 June , 2026 — जून 2026 का ऐतिहासिक अमेरिका-ईरान समझौता 100 से अधिक दिनों के विनाशकारी संघर्ष का एक अस्थिर परिणाम है। इसने मध्य पूर्व के सुरक्षा समीकरणों को मौलिक रूप से बदलने के साथ-साथ भारत के ऊर्जा और रणनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित किया है।
मध्य जून 2026 में एक व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) की घोषणा की गई, जिसके औपचारिक हस्ताक्षर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने तय हैं। यह आधुनिक अमेरिकी राष्ट्रपति इतिहास के सबसे उतार-चढ़ाव वाले राजनयिक दौर का अंत है। इस 100 दिवसीय युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को ईरानी धरती पर अमेरिका और इजरायल के अचानक हवाई हमलों से हुई थी। इसके बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार पूर्ण सैन्य टकराव और समझौते के बीच डोलते रहे हैं।
ट्रंप की ईरान रणनीति में आए उतार-चढ़ाव
महीनों तक ट्रंप प्रशासन ने “मैक्सिमम प्रेशर 2.0” (अधिकतम दबाव 2.0) की रणनीति अपनाई। इसके तहत ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण नौसैनिक नाकेबंदी की गई और ईरान के सैन्य राडार व ड्रोन ठिकानों पर सीधे मिसाइल हमले किए गए। ट्रंप ने स्पष्ट घोषणा की थी कि जब तक एक व्यापक और सत्यापित परमाणु व बैलिस्टिक संधि पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाती, तब तक वाशिंगटन ईरान की जमी हुई संपत्ति का एक भी डॉलर जारी नहीं करेगा।
लेकिन जब इस संघर्ष का आर्थिक असर वैश्विक ऊर्जा संकट के रूप में सामने आया और ईरान के जवाबी ड्रोन हमले में कुवैत अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को भारी नुकसान पहुंचा, तो ट्रंप के बयानों का रुख पूरी तरह बदल गया। मध्य जून तक ट्रंप ने अपनी ही तय की गई सीमाओं को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने विदेश में जमी हुई 25 अरब डॉलर की ईरानी राशि को चरणबद्ध तरीके से जारी करने की मंजूरी दे दी, जिसमें तकनीकी वार्ता से पहले ही 12 अरब डॉलर की अग्रिम राशि का हस्तांतरण शामिल था। इसके साथ ही ईरानी तेल की बिक्री पर अस्थायी छूट भी दे दी गई।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर सभी पक्षों को एक “पूर्ण” समझौते की बधाई दी और लिखा: “अपने इंजन शुरू करो, तेल बहने दो।” उनका यह बयान महीनों से दी जा रही सख्त चेतावनियों के बिल्कुल उलट था।
स्विट्जरलैंड समझौते का मुख्य ढांचा
तेहरान में चली 17 घंटे की लंबी बैठकों के दौरान मुख्य रूप से पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से यह शुरुआती ढांचा तैयार हुआ। इसके तहत 60 दिनों का एक कड़ा कार्यान्वयन चक्र तय किया गया है:
- सुरक्षित समुद्री मार्ग: ईरान 30 दिनों का बारूदी सुरंग हटाने (माइन-क्लियरिंग) का अभियान चलाएगा, और इस 60 दिनों की अवधि के दौरान कोई पारगमन शुल्क (टोल) नहीं लिया जाएगा।
- नाकेबंदी का खात्मा: अमेरिका अपनी पूर्ण नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा और ईरान अपने क्षेत्रीय छद्म (प्रॉक्सी) अभियानों को रोकेगा।
- परमाणु कार्यक्रम पर रोक: तेहरान यूरेनियम संवर्धन को मौजूदा स्तर पर ही रोक देगा और ईरान के भीतर अत्यधिक संवर्धित स्टॉक को कम करने का वादा करेगा।
- वित्तीय राहत: वाशिंगटन सीधी नकद राशि और क्रेडिट लाइनों के माध्यम से 25 अरब डॉलर की विदेशी संपत्ति जारी करेगा और नए प्रतिबंधों पर रोक लगाएगा।
व्हाइट हाउस और यरूशलेम में मतभेद
यद्यपि इस समझौते से तत्काल युद्धविराम हो गया है, लेकिन व्हाइट हाउस और यरूशलेम (इजरायल) के बीच सार्वजनिक रूप से बढ़ते मतभेदों के कारण इसकी दीर्घकालिक सफलता पर खतरा मंडरा रहा है। इस विवाद की मुख्य वजह क्षेत्रीय सुरक्षा का दायरा है। समझौते के मसौदे में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क को शामिल नहीं किया गया है, बल्कि इसका पूरा ध्यान केवल परमाणु सीमाओं और समुद्री स्वतंत्रता पर है।
इस समझौते से इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बेहद नाराज हो गए। ट्रंप की संयम बरतने की चेतावनियों को चुनौती देते हुए इजरायली वायुसेना ने 14 जून (रविवार) को उत्तरी इजरायल में हुए रॉकेट हमलों के जवाब में बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए।
इस सैन्य कार्रवाई से पूरा राजनयिक प्रयास खटाई में पड़ता दिखाई दिया। इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू को एक “बेहद कठिन व्यक्ति” कहा और चेतावनी दी कि क्षेत्रीय दुश्मनी तुरंत बंद होनी चाहिए। दूसरी ओर, ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बकर कलीबाफ ने चेतावनी दी कि कूटनीति का भविष्य पूरी तरह से इजरायल को रोकने की वाशिंगटन की क्षमता पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि बिना तालमेल के किए गए किसी भी एकतरफा हमले से यह नया समझौता रद्द माना जाएगा।
भारत के लिए रणनीतिक प्रभाव
फारस की खाड़ी और व्यापक मध्य पूर्व में शांति की बहाली से नई दिल्ली के लिए गहरे आर्थिक और रणनीतिक लाभ जुड़े हैं। दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक होने के नाते, भारत होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से बुरी तरह प्रभावित हुआ था, जहाँ से दुनिया के कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है।
खाड़ी में सामान्य समुद्री पारगमन शुरू होने से कच्चे तेल की कीमतें कम होंगी, जिससे भारत का आयात बिल और घरेलू मुद्रास्फीति कम होगी। इसके साथ ही, नौसैनिक नाकेबंदी हटने से दक्षिण-पूर्वी ईरान में स्थित भारत की प्रमुख परियोजना, चाबहार बंदरगाह के विकास को नई गति मिलेगी। इस बदलते परिदृश्य में अमेरिका-ईरान शांति का स्वागत करने के साथ-साथ, भारत को इजरायल के साथ भी अपनी रक्षा साझेदारी बनाए रखनी होगी
क्षेत्रीय शक्ति का विकेंद्रीकरण
अंततः स्विट्जरलैंड का यह समझौता दिखाता है कि मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था अब किसी एक महाशक्ति के इशारों पर नहीं चलती। इस संघर्ष ने क्षेत्रीय शक्ति का विकेंद्रीकरण कर दिया है। इसने साबित कर दिया है कि इजरायल, वाशिंगटन की स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद स्वतंत्र रूप से हमले कर सकता है, और तेहरान समुद्री रास्तों को रोककर बड़ी वित्तीय रियायतें हासिल कर सकता है।
जुलाई में दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार के साये में जब यह 60 दिनों की तकनीकी वार्ता शुरू हो रही है, तब यह पूरा क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस “खूबसूरत शांति” की कल्पना की है, वह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि व्हाइट हाउस अपने सबसे करीबी सहयोगी (इजरायल) से नियमों का पालन करवा पाता है या नहीं। अन्यथा, इस छद्म युद्ध की अनसुलझी लहरें इस क्षेत्र को फिर से पूर्ण युद्ध की ओर धकेल सकती हैं। इसके अलावा, इस समझौते ने मुख्य विवादों (जैसे परमाणु निरीक्षण, इजरायल की भूमिका और सटीक आर्थिक शर्तें) को अभी पूरी तरह से नहीं सुलझाया है। इस सौदे का भविष्य अब इसी सप्ताह होने वाले औपचारिक हस्ताक्षरों और अंतिम समझौते के लिए होने वाली कड़ी वार्ताओं पर टिका है।
(असद मिर्ज़ा अंतर्राष्ट्रीय, रक्षा और रणनीतिक मामलों के नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ समीक्षक हैं।)

