अमेरिका-ईरान युद्धविराम कैसे बिखर रहा है
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असद मिर्ज़ा
29 June 2026 -- इस्लामाबाद मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि फारस की खाड़ी में एक बार फिर मिसाइलें और ड्रोन उड़ने लगे। वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक हफ्ते के जवाबी हमलों ने — जिसमें लेबनान पर इज़राइल की निर्मम बमबारी भी शामिल रही — यह साबित कर दिया कि जून 2026 का अमेरिका-ईरान युद्धविराम एक नाज़ुक ढाँचा है, जो वास्तविक रणनीतिक सहमति के बजाय महज़ कूटनीतिक थकान के सहारे टिका हुआ है।
जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने 17 जून 2026 को इस्लामाबाद मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए तो दुनिया को एक उम्मीद भरी तस्वीर दिखाई दी: 2003 की इराक जंग के बाद मध्य पूर्व का सबसे खतरनाक सैन्य टकराव आखिरकार थमता नज़र आया। पाकिस्तान और क़तर की महीनों की मध्यस्थता से तय हुए इस समझौते ने 2026 की ईरान जंग के स्थायी अंत के लिए बातचीत हेतु 60 दिवसीय युद्धविराम का ढाँचा स्थापित किया। लेकिन दो हफ्ते भी नहीं बीते कि यह सपना चकनाचूर हो गया — टूटे वादों, ईरानी उकसावों, इज़राइली अड़ियलपन, और एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति के अस्थिर मिज़ाज की भेंट चढ़ गया जो एक दिन ईरान को नेस्तनाबूद करने की धमकी देता है और अगले दिन व्यापारिक प्रलोभन पेश करता है।
युद्धविराम जो कभी था ही नहीं
मौजूदा संकट को समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि युद्धविराम अपने शुरुआती दौर से ही कितनी लड़खड़ाहट के साथ चला है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में 7-8 अप्रैल 2026 को तय हुए दो हफ्ते के शुरुआती युद्धविराम को दोनों पक्षों ने लगभग तुरंत तोड़ दिया। कम तीव्रता की झड़पें कभी नहीं रुकीं। ट्रंप ने 21 अप्रैल को युद्धविराम को "अनिश्चितकाल" के लिए बढ़ा दिया, फिर भी अमेरिकी सेना ने मई में ईरान में ठिकानों पर हमले किए। ईरान ने शिपिंग को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की। हर पक्ष ने दूसरे को पहल करने का दोषी ठहराया; और दोनों ही सही थे।
17 जून का मेमोरेंडम इस चक्र से बाहर निकलने का रास्ता होना था। इसके बजाय उसने इस चक्र को और तेज़ कर दिया। 26 जून को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में एक ड्रोन से सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज़ को निशाना बनाया। अमेरिकी नौसेना और वायुसेना के विमानों ने जलडमरूमध्य के आसपास ईरान के दस सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिनमें निगरानी का बुनियादी ढाँचा, संचार प्रणालियाँ, वायु रक्षा केंद्र, ड्रोन भंडारगृह और बारूदी सुरंग बिछाने की क्षमता शामिल थी।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों को 18 जून के मेमोरेंडम का "स्पष्ट उल्लंघन" करार देते हुए कहा कि इससे ज़ाहिर होता है कि "अमेरिकी सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं की कोई परवाह नहीं करती।" इसके बाद ईरान ने कुवैत में अली अल-सलेम वायु अड्डे और बहरीन में अमेरिकी पाँचवें बेड़े के मुख्यालय पर बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे। 28 जून तक दोनों पक्ष नई वार्ता से पहले हमले रोकने पर राज़ी हो गए — मगर यह सहमति अप्रैल के युद्धविराम के बाद सबसे भीषण दो दिनों के जवाबी हमलों के बाद बनी।
यह युद्धविराम नहीं है। यह एक काबू में लाई गई तनावपूर्ण स्थिति है जो कूटनीति का लबादा ओढ़े हुए है।
नेतन्याहू:एक सहयोगी जो तोड़फोड़िया बन गया
अमेरिका-ईरान के नाज़ुक कूटनीतिक ढाँचे को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाला अगर कोई है तो वह इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हैं। जैसे-जैसे शांति वार्ता ने रफ्तार पकड़ी, इज़राइल लेबनान में उलटी दिशा में बढ़ता रहा, जहाँ उसकी हिज़्बुल्लाह के खिलाफ जंग इतनी भीषणता से जारी रही कि चार हज़ार से अधिक लोग मारे गए, दस लाख से ज़्यादा विस्थापित हुए और दक्षिणी लेबनान के दर्जनों गाँव मलबे में तब्दील हो गए।
ईरान ने हमेशा एक माँग को गैर-शर्ती रखा: किसी भी व्यापक समझौते में लेबनान पर इज़राइली हमलों का अंत शामिल होना चाहिए। नेतन्याहू ने उतनी ही दृढ़ता से इनकार किया,
यह मतभेद महज़ रणनीति का नहीं, बल्कि कहीं ज़्यादा गहरा है। मई के आखिर की रिपोर्टों के मुताबिक नेतन्याहू और उनका करीबी दायरा उभरते अमेरिका-ईरान समझौते को निजी बैठकों में "विनाशकारी" करार देते हैं — इस आशंका से कि यह ईरान की क्षेत्रीय हैसियत बहाल करेगा, जमे हुए संपत्तियाँ आज़ाद करेगा, और तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को अस्पष्ट छोड़ देगा, खत्म नहीं करेगा।
ट्रंप का डाँवाडोल रवैया
अमेरिकी रणनीति की बुनियादी समस्या उसके शीर्ष की असंगति है। केवल 23 मार्च से 9 जून के बीच ट्रंप ने कम से कम 38 बार दावा किया कि ईरान के साथ समझौता करीब है। उन्होंने ईरान को बिना शर्त आत्मसमर्पण की धमकी दी, फिर जमे हुए ईरानी संपत्तियाँ ईरानी जनता के लिए अमेरिकी अनाज खरीदने में इस्तेमाल करने की पेशकश की। उन्होंने मार्च के आखिर में घोषणा की कि अमेरिका ने जंग "जीत ली" जबकि ईरानी मिसाइलें बरसती रहीं। उन्होंने 21 जून को फोर्डो, नतांज़ और इस्फ़हान के परमाणु केंद्रों पर हमलों का आदेश दिया — और तीन दिन बाद युद्धविराम का ऐलान कर दिया।
यह जानबूझकर अपनाया गया रणनीतिक अस्पष्टता का हथियार नहीं है; यह एक ऐसे नेता की अनियमित उपज है जो कोई सुसंगत मंज़िल सामने रखे बिना आगे बढ़ रहा है। ईरान को हमले जारी रहने पर "सैन्य तरीके से काम पूरा करने" की ट्रंप की धमकियाँ — और यह चेतावनी कि ईरानी सरकार "अस्तित्व में नहीं रह सकती" — एक साथ अवरोधक का काम भी करती हैं और ईरानी कट्टरपंथियों को और सख्त भी बनाती हैं।
ट्रंप इस समझौते से क्या चाहते हैं यह अपेक्षाकृत स्पष्ट है: होर्मुज़ जलडमरूमध्य का फिर से खुलना ताकि ऊर्जा बाज़ार सुधरें और वे एक बड़ी कूटनीतिक सफलता का दावा कर सकें। जो वे स्वीकार करने को तैयार नहीं वह एक टिकाऊ समझौते का कठिन ढाँचा है: सत्यापन योग्य परमाणु प्रतिबंध, ईरान के क्षेत्रीय छद्म-नेटवर्क का फ्रेमवर्क, और लेबनान में इज़राइल को लगाम देने का तंत्र।
पश्चिम एशियाई सुरक्षा: एक बदला हुआ परिदृश्य
मेमोरेंडम का अंतिम भाग्य जो भी हो, 2026 की जंग पश्चिम एशिया का रणनीतिक नक्शा पहले ही इस तरह बदल चुकी है जो किसी एक युद्धविराम से परे तक असर डालेगी। ईरान, जंग में बच तो गया मगर सैन्य दृष्टि से कमज़ोर, आर्थिक रूप से तबाह, और कूटनीतिक मैदान में अकेला होकर निकला है। उसके नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई को अपने पिता से अधिक जुझारू माना जाता है — जनवरी 2026 के बड़े पैमाने के जनविद्रोहों से पहले से टूटी हुई ईरान की राजनीति में एक खतरनाक परिवर्तनशील कारक।
खाड़ी के देश — बहरीन, कुवैत, क़तर — ईरानी मिसाइल हमलों और होर्मुज़ की बंदी से गंभीर नुकसान उठा चुके हैं और समुद्री आवागमन की स्थायी स्वतंत्रता की गारंटी पर ज़ोर देंगे।
28 जून का हमले रोकने और वार्ता फिर शुरू करने का समझौता उम्मीद का एक पतला धागा देता है। मगर जब तक इज़राइल लेबनान पर हमले जारी रखता है, ईरान मेमोरेंडम को अलागू मानता है; जब तक ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़रानी को रोकता रहता है, अमेरिका मेमोरेंडम को उल्लंघन-ग्रस्त मानता है।
युद्धविराम को अंदर से वही पक्ष खोखला कर रहे हैं जिन्होंने इस पर दस्तखत किए, और बाहर से एक ऐसा सहयोगी जिसे कोई पूरी तरह काबू नहीं कर सकता। जब तक लेबनान का सवाल हल नहीं होता — और जब तक ट्रंप यह तय नहीं कर लेते कि वे वाकई शांति बना रहे हैं या महज़ उसका नाटक कर रहे हैं — मध्य पूर्व जंग जारी रहेगी।
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(असद मिर्ज़ा अंतर्राष्ट्रीय, रक्षा और रणनीतिक मामलों के नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ समीक्षक हैं।)
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Asad Mirza
Asad Mirza is a Delhi-based journalist, author and media educator who has worked with AIR, Khaleej Times (Dubai), the BBC World Service and the British High Commission in New Delhi.
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