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कैसे बहु-मोर्चीय युद्ध ट्रंप-ईरान कूटनीति को उलट रहा है

AM
Asad Mirza

· 6 min read

असद मिर्ज़ा

5 June 2026 - अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का नवीनतम चरण एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है। एक ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सार्वजनिक रूप से वार्ताओं को “उबाऊ” बताते हुए उनकी उपयोगिता को खारिज करते हैं और उनके परिणामों के प्रति उदासीनता जताते हैं, वहीं दूसरी ओर वॉशिंगटन और तेहरान किसी संभावित समझौते की संभावनाओं को तलाशना जारी रखे हुए हैं। लेकिन लेबनान में बढ़ती इज़राइली सैन्य कार्रवाइयाँ कूटनीतिक प्रयासों को पटरी से उतारने और क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा करने का खतरा पैदा कर रही हैं।

पिछले लगभग तीन महीनों से मध्य पूर्व एक ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता की संभावना और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध के खतरे के बीच फँसा हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ताएँ, जिनका उद्देश्य युद्धविराम को मजबूत करना, होरमुज़ जलडमरूमध्य को पुनः खोलना और सैन्य तनाव को कम करना है, अब दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों से कहीं अधिक जटिल हो चुकी हैं। विशेष रूप से, लेबनान में इज़राइल और हिज़्बुल्लाह के बीच बढ़ता संघर्ष कूटनीतिक प्रगति में एक बड़ी बाधा बनकर उभरा है।

नया मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ताओं के महत्व को कमतर आंकते हुए कहा कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बातचीत सफल होती है या असफल। 1 जून को दिए गए कई साक्षात्कारों में ट्रंप ने इन चर्चाओं को “बहुत उबाऊ” बताया और कहा कि ये बहुत लंबे समय से चल रही हैं। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई जब खबरें थीं कि लेबनान में इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में ईरान ने मध्यस्थों के माध्यम से वॉशिंगटन के साथ अपने अप्रत्यक्ष संपर्क निलंबित कर दिए हैं।

हालाँकि ट्रंप की बयानबाज़ी के पीछे वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। वार्ताओं को खारिज करने के कुछ ही घंटों बाद उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत “तेज़ गति से जारी” है और बाद में आशा व्यक्त की कि एक सप्ताह के भीतर समझौता हो सकता है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन अभी भी तेहरान के साथ एक व्यापक समझ विकसित करने के प्रयासों में सक्रिय रूप से जुटा हुआ है, जिससे युद्धविराम को बढ़ाया जा सके, होरमुज़ जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके और नए संघर्ष की आशंका कम की जा सके।

यह स्पष्ट विरोधाभास ट्रंप प्रशासन पर पड़ रहे परस्पर प्रतिस्पर्धी दबावों को दर्शाता है। एक ओर व्हाइट हाउस अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है और यह दिखाना चाहता है कि वह वार्ताओं पर निर्भर नहीं है। दूसरी ओर, ईरान के साथ लंबे समय तक चलने वाले टकराव के आर्थिक और रणनीतिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

तेहरान के दृष्टिकोण से देखें तो ये वार्ताएँ कभी भी केवल वॉशिंगटन के साथ द्विपक्षीय मुद्दों तक सीमित नहीं रही हैं। ईरानी अधिकारी क्षेत्रीय संघर्षों को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते हैं। ईरानी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, अप्रत्यक्ष वार्ताओं को निलंबित करने का निर्णय लेबनान और गाज़ा में इज़राइली सैन्य अभियानों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ था। ईरान का तर्क है कि किसी भी युद्धविराम व्यवस्था को सभी मोर्चों पर लागू होना चाहिए और इज़राइल के लगातार हमले कूटनीति की बुनियाद को कमजोर करते हैं।

इस रुख को लेबनान में इज़राइली कार्रवाइयों की निंदा करने वाले ईरानी सैन्य और राजनीतिक नेताओं के बयानों ने और मजबूत किया। ईरानी अधिकारियों ने इन अभियानों को असहनीय उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरे में डालते हैं और कूटनीतिक प्रयासों को कठिन बनाते हैं। ऐसी बयानबाज़ी हिज़्बुल्लाह के प्रमुख क्षेत्रीय समर्थक के रूप में ईरान की लंबे समय से चली आ रही भूमिका को दर्शाती है और यह भी बताती है कि व्यापक रणनीतिक समीकरण में लेबनान कितना केंद्रीय स्थान हासिल कर चुका है।

लेबनान का मुद्दा संभवतः अमेरिकी कूटनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। यद्यपि वॉशिंगटन ने इज़राइल और हिज़्बुल्लाह के बीच मध्यस्थता का प्रयास किया है, लेकिन ज़मीनी स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया कि उन्हें इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से सैन्य संयम का आश्वासन मिला है और उन्होंने यह भी संकेत दिया कि हिज़्बुल्लाह हमले रोकने पर सहमत हो गया है। लेकिन बाद की घटनाओं और इज़राइली अधिकारियों के परस्पर विरोधी बयानों ने ऐसे किसी भी समझौते की स्थायित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इज़राइल के लिए रणनीतिक गणना वॉशिंगटन से काफी अलग है। इज़राइली नेतृत्व अब भी हिज़्बुल्लाह को एक अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखता है और उसकी सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए प्रतिबद्ध है। परिणामस्वरूप, तनाव कम करने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद दक्षिणी लेबनान में इज़राइली अभियान जारी हैं। यह मतभेद अमेरिका के लिए एक कठिन संतुलन की स्थिति पैदा करता है, क्योंकि उसे अपने इज़राइली सहयोगी का समर्थन भी करना है और साथ ही ईरान के साथ व्यापक समझौते की संभावना को भी जीवित रखना है।

इस प्रकार वॉशिंगटन, तेहरान और यरुशलम से बना कूटनीतिक त्रिकोण समकालीन मध्य-पूर्वी भू-राजनीति की जटिलता को दर्शाता है। पूर्व के परमाणु-केंद्रित वार्तालापों के विपरीत, वर्तमान चर्चाएँ क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री मार्गों, प्रॉक्सी संघर्षों और युद्धविराम व्यवस्थाओं सहित कहीं अधिक व्यापक मुद्दों को समेटे हुए हैं। एक क्षेत्र में सफलता अब दूसरे क्षेत्रों में प्रगति पर निर्भर होती जा रही है।

वर्तमान संकट की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता सार्वजनिक संदेशों और पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति के बीच का स्पष्ट अंतर है। ट्रंप के सार्वजनिक बयान अक्सर वार्ताओं के प्रति अधीरता और संदेह को दर्शाते हैं, लेकिन रिपोर्टें बताती हैं कि उनका प्रशासन समझौता सुनिश्चित करने के लिए गहन प्रयास जारी रखे हुए है। संभव है कि इस दोहरे दृष्टिकोण का उद्देश्य ईरान पर दबाव बनाए रखना और घरेलू राजनीतिक दर्शकों को यह विश्वास दिलाना हो कि वॉशिंगटन किसी कमजोर स्थिति से बातचीत नहीं कर रहा है।

इस बीच, ईरान अपनी स्वयं की रणनीतिक दुविधाओं का सामना कर रहा है। यद्यपि तेहरान प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय स्थिरता और अपनी सुरक्षा चिंताओं की मान्यता चाहता है, लेकिन उसे अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ एकजुटता भी प्रदर्शित करनी है। यदि यह धारणा बनती है कि ईरान हिज़्बुल्लाह को छोड़ रहा है या इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों को बिना प्रतिक्रिया स्वीकार कर रहा है, तो तथाकथित “प्रतिरोध धुरी” में उसकी स्थिति कमजोर पड़ सकती है। इसलिए ईरानी वार्ताकारों को व्यावहारिक कूटनीति और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

इसलिए आने वाले दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। ट्रंप का यह दावा कि एक सप्ताह के भीतर समझौता हो सकता है, संकेत देता है कि पर्दे के पीछे पहले से ही पर्याप्त प्रगति हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, होरमुज़ जलडमरूमध्य को पुनः खोलने और युद्धविराम को बनाए रखने के तंत्र पर चर्चाएँ जारी हैं। लेकिन लेबनान में होने वाली हर नई सैन्य घटना इन प्रयासों को विफल कर सकती है।

अंततः अमेरिका-ईरान संबंधों का भविष्य नेताओं की बयानबाज़ी से कम और ज़मीनी घटनाक्रमों से अधिक निर्धारित होगा। मौजूदा संकट यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय संघर्ष किस तरह गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। बेरूत में होने वाला एक हमला मस्कट या वॉशिंगटन में चल रही वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है, जबकि होरमुज़ जलडमरूमध्य में तनाव एशिया से यूरोप तक ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल कूटनीति जीवित है, भले ही अत्यंत नाजुक स्थिति में। सार्वजनिक घोषणाओं, राजनीतिक बयानबाज़ी और सैन्य तनाव के बावजूद वार्ताएँ पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई हैं। वे किसी स्थायी समझौते तक पहुँचती हैं या फिर नए टकराव में बदल जाती हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इज़राइल, ईरान और अमेरिका सहित सभी पक्ष अल्पकालिक सामरिक लाभों के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता को कितनी प्राथमिकता देते हैं।

इस संकट के दाँव केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। मुद्दा केवल अमेरिका-ईरान संबंधों का भविष्य नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा संरचना और वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों की स्थिरता का भी है। इस दृष्टि से देखा जाए तो इन वार्ताओं का परिणाम फ़ारस की खाड़ी के तटों से कहीं आगे तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सकता है।

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Asad Mirza

Asad Mirza is a Delhi-based journalist, author and media educator who has worked with AIR, Khaleej Times (Dubai), the BBC World Service and the British High Commission in New Delhi.

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